ગુલહસનના બ્લોગ પર આપનુ હાર્દિક સ્વાગત છે.

गजल

मोह्बतने मुझे मारा था मोह्बतने संवारा हे,
मेरा ये जीवन दिया हुआ नजराना तुम्हारा हे।
आज में मोतसे लिपट जाऊ तो क्या कारलेगी ?
आज तो मेने उसे सरेआम ललकारा हे।
केस तो लेला की मोह्बतमे ख़ुद को भूल जाता था,
नासमज थे, जो समजते थे बदचलन हे, आवारा हे।
बनाकर फकीरों का भेस फिरता था दर- बदर,
"गुल" तो "नाज " की गलियोमे भटकताहुआ बंजारा हे.
गुल पोरबंदरी।

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